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सिर्फ मनोरंजन ही नहीं,सूचना और जानकारी भी देती हैं फिल्‍में

Posted On: 27 Jan, 2010 मस्ती मालगाड़ी में

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हाल ही हमलोगों ने सिनेमा का अद्भुत चमत्‍कार ‘अवतार’ के रूप में देखा। ले‍खक-निर्देशक की कल्‍पना को तकनीक का सहारा मिल जाए तो उसकी उड़ान असीम हो सकती है। नावी ग्रह के नागरिकों को देखते हुए हम उनके दुख-दर्द से जुड़ जाते हैं और अपने ग्रह के नागरिकों के प्रति ही हमारा क्रोध जागने लगता है। फिल्‍म के इस उपयोग और संभावनाओं के बाद अगर हैती में आए भूकंप के दृश्‍यों को याद करें तेा हम एक और संभावना से परिचित होते हैं।
हैती में भूकंप आने पर दुनिया से उसका रिश्‍ता टूट गया। सब कुछ धराशायी हो गया। बाहरी मीडिया के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वहां मची तबाही की सही तस्‍वीर जल्‍दी से जल्‍दी पेश कर सकें। हैती के दक्षिण-पूर्वी में बसे जैकमल शहर में सन् 2008 में सिने इंस्‍टीट्टूयट की स्‍थपना हुई थी। निदेशक डेविड बेले ने सोचा था कि सिने इंस्‍टीट्यूट में वे स्‍टूडेंट को फिल्‍ममेकिंग का पाठ पढ़ाएंगे ताकि वे अपनी भाषा में अपनी संस्‍कृति और सोच पर केंद्रित फिल्‍में बना सकें। बमुश्किल चालीस हजार की आबादी के इस शहर ने इतिहास में कई पेंटर और आर्टिस्‍ट दिए हैं। कभी फ्रांस के अधिपत्‍य में रहे जैकमल शहर में फ्रांसीसी प्रभाव के अवशेष मौजूद हैं।
फिलहाल, भूकंप में सिने इंस्‍टीट्यूट की इमारत ढह गई। फिल्‍ममेकिंग के सारे सामान मलबे में दब गए। तबाही और निराशा के इस माहौल में सिने इंस्‍टीट्यूट के स्‍टूडेंट ने मलबे से कैमरे और दूसरे जरूरी उपकरण निकाले। 12 जनवरी से ही उन्‍होंने शहर और देश में मची तबाही की चलती-फिरती तस्‍वीरें कैद कीं और उनसे अपने देश के आप्रवासी नागरिकों और दुनिया को परिचित कराया। उनकी फिल्‍में रॉ हैं,लेकिन उन्‍होंने भूंकेप के बाद के हड़कंप और मनोदशा को फुटेज के जरिए दुनिया के बीच पहुंचाया। दुनिया के समाचार चैनलों ने उनका ररूरी उपयोग किया। जैकमल शहर के स्‍टूडेंट ने फिल्‍म के माध्‍यम से विश्‍वसनीय जानकारी दी। दुनिया को झकझोरा और सभी को मदद के लिए प्रेरित किया। गौर करें कि ये लघु फिल्‍में उन स्‍टूडेंट ने बनायी है,जिनके अपने घर ढह गए हैं। संकट की इस घड़ी में उन्‍होंने फिल्‍म का प्रभावशाली उपयोग किया है।

फिल्‍में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं। फिल्‍में हमें झकझोरती हैं। हमारी अंतश्‍चेतना को जगाती हैं। हमें मानवीय बनाने के साथ मानवता के लिए कुछ करने की दिशा में प्रेरित करती हैं। जैकमल के स्‍टूडेंट ने खिा दिया है कि 21 वीं सदी में फिल्‍में सूचना और जानकारी के रूप में मानवता के लिए किस हद तक जरूरी हैं।
मौका और समय हो तो उनके सिने इंस्‍टीट्यूट के वेबसाइट पर जाकर खुद देखें।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Vats के द्वारा
January 28, 2010

ब्रह्मात्मज जी, फ़िल्में मनोरंजन के साथ ज्ञान वर्धन भी करती हैं. लेकिन अधिकाँश फ़िल्में एक विशेष प्रकार के ग्लैमर और बुराएयों को ही बढ़ावा देती हैं. हालांकि कोशिश होनी चाहिए कि सार्थक और मनोरंजक फ़िल्में एक साथ बनें.

Jack के द्वारा
January 28, 2010

बिलकुल ब्रहमात्ज जी, फिल्में मनोरंजन के साथ ज्ञान भी देती हैं इसलिए फिल्मकारों को फिल्म बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए की कही कोई गलत संदेश न जा रहा हो. हम उम्मीद करते हैं कि भारतीय फिल्मकार इस बारे में ध्यान रखेगें.


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