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नज़ीर अकबराबादी की नज़र होली पर

Posted On: 28 Feb, 2010 मस्ती मालगाड़ी में

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दोस्‍तों होली के मौके पर नज़ीर अकबराबादी की दो रचनाएं पेश हैं। नज़ीर के मुरीद उनके बारे में जानते हैं। नज़ीर ने उर्दू शायरी में आम जीवन के रंग बिखेरे और ऐसे विषयों पर लिखा,जिन्‍हें आज भी साहित्‍य का विषय नहीं माना जाता। उन्‍होंने आटा-दाल,रोटी,रुपया,पैसा,पंख,फल-फूल और सभी त्‍योहारों पर लिखा। नज़ीर आगरा शहर के थे। तब इसे अक़बराबाद कहा जाता था,इसलिए वली मोहम्‍मद ने अपना नाम नज़ीर अकबराबादी रखा था। उनकी पहली नज़्म को आप छाया गांगुली की आवाज़ में सुन सकते हैं। उसके लिए पहली नज़्म के शीर्षक पर क्लिक करें …
जब फागुन रंग झमकते हों

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के ‘नज़ीर’ भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।

जब खेली होली नंद ललन
जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ble900 के द्वारा
March 6, 2010

हैलो मेरा नाम याद है आशीर्वाद मैं अपनी प्रोफ़ाइल देखने और जैसे तुम मुझे वापस मेरे निजी ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं soumah.Blessing@yahoo.co.uk) मेरी तस्वीर है और मेरी जानकारी अपने मेल के लिए इंतज़ार कर रहा हूँ धन्यवाद आशीर्वाद Hello my name is miss Blessing i see your profile and like it can you contact me back at my private email(soumah.Blessing@yahoo.co.uk) to have my photo and my details am waiting for your mail thanks Blessing

Upendra के द्वारा
March 2, 2010

बेहद शुक्रिया अजय भाई। दो दिन से नज़ीर अकबराबादी की इस नज्म की तलाश में था। पहली नज्म की पहली पंक्ति तो ध्यान में थी लेकिन आगे की नहीं। पढ़कर मजा आ गया। इसके आगे कहां भला होली के बॉलीवुडिया गाने टिकेंगे।

Tufail के द्वारा
March 2, 2010

Hello Baralumatmaj Ji, Very Happy & Prosperous Holi. At this colourful occasion of Holi, you presented very-very nice articles. I think all Indians should thankful to you. These articles represent the real Indian holi.

Jack के द्वारा
March 2, 2010

ब्रहमात्ज जी, यह बहुत ही सुन्दर रचना की प्रस्तुति की है आपनें .धन्यवाद

समीर लाल के द्वारा
February 28, 2010

आपका बहुत आभार इन रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए. ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें. पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें, खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें. आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक. -समीर लाल ’समीर’


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