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नमक-मिर्च मिले तो जिंदगी और स्‍वाद खिले

Posted On: 29 Mar, 2010 में

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अचार और गुलजार… गुलजार के प्रशंसक नाराज न हों। मुझे लगता है कि अगर गुलजार ने इश्‍क के नमक में मिर्च और थोड़ा तेल भी मिला दिया होता तो इश्‍क चटखारा हो गया होता। नमक-मिर्च डालने और लगाने का मुहावरा आम है। हम फिल्‍म पत्रकारों का आधा काम इसी नमक-मिर्च से होता है। कई बार हम तेल भी मिला देते हैं और फिर दर्शक देखते हैं तेल की धार और पाठक लेते हैं चटखारे। नमक-मिर्च का गुण ही कुछ ऐसा है, जिस तत्‍व, पदार्थ, बात में लगा दें, वह अपना मूल गुण छोड़ कर कोई और रंग और स्‍वाद ले लेता है। स्‍वाद मर्मज्ञ बताते हैं कि नमक-मिर्च के उत्‍प्रेरक गुणों को हम भारतीयों ने बहुत पहले पहचान लिया था। हमने नमक-मिर्च डाल कर अचार बनाना शुरू किया। भारत में किसी भी खाद्य सब्‍जी, फल, जीव-जंतु का अचार बनाया जा सकता है और बनता भी है।मेरे दोस्‍त अमिताभ की मां अदरख, हरी मिर्च, चना और सरसों मिला कर ऐसा अचार तैयार करती थीं कि 1976 से 1980 के बीच मैंने दरभंगा में उनके इस नायाब अचार के साथ उनके हाथों से हजारों पराठे खाए होंगे। अचार में उस ताजगी, चटख और स्‍वाद का अनुभव रिपीट नहीं किया जा सका। रोजाना मैं खाऊं न खाऊं, लेकिन मेरी रसोई और डायनिंग टेबल के आसपास अचार का बोईयाम या शीशी हो तो मेरा कांफीडेंस बना रहता है। मैं अचार को भारतीय व्‍यंजन की पूरक सामग्री नहीं मानता। मेरे हिसाब से वह आवश्‍यक सामग्री है। औपचारिक भोज-भात में अचार के बगैर थाली नहीं सजती। जिन घरों में डायनिंग टेबल आ गए हैं, वहां टेबल पर कटोरियां और जैम की छोटी शीशियों में अचार जरूर होते हैं। अब तो अचार की इतनी कंपनियां आ गई हैं। वे डिफरेंट ब्रांड से घर-देहात के विशेष अचारों की पैकेजिंग कर रही हैं। डिब्‍बाबंद और शीशी में आए अचार स्‍वाद के चटखारे की भरपाई नहीं कर पाते। शहरी रिश्‍तों के तरह बाजार से आए अचार में एक सिंथेटिक असर रहता है। लगता है कि अचार जैसा कुछ खा रहे हैं, लेकिन मिठास, खटास, तीखेपन, झांस और कसैलेपन में कमी रह जाती है।
भारतीय व्‍यंजनों में अचार क्‍यों और कैसे आया? इस पर वीर संघवी को कभी लिखना चाहिए। संजीव कपूर भी कुछ प्रकाश डाल सकते हैं। अपने विष्‍णु त्रिपाठी जी भी आदेश,नाराजगी या शिकायत जाहिर कर लिखवा सकते हैं। वे खुद लिखें तो स्‍वाद बझ़ जाए। एक भारतीय के तौर पर हमें अचार की परंपरा की संरक्षण पर विशेष ध्‍यान देना चाहिए। भारतीय खान-पान की यह अनोखी सामग्री धीरे-धीरे लुप्‍त हो रही है। शहरों और देहातों तक में अब इतनी फुर्सत नहीं है कि पारंपरिक तरीके से अचार तैयार किया जा सके। मुझे याद है कैसे आम और मिर्च के अचार बनाने में मां कई दिनों तक लगी रहती थी। अचार बनाने में धूप की बड़ी भूमिका होती है। और फिर गंदे या गीले हाथ से कभी अचार छू जाए तो वह खराब हो जाता है। हमेशा साफ और सूखे हाथों से ही अचार निकालने की इजाजत मिलती थी। अब तो अचार वाले चीनी-मिट्टी के बोईआम भी नहीं मिलता।बिहार के घरों में आम और मिर्च के अचार पूरे साल मिलते हैं। शायद ही कोई परिवार अचार के मामले में गरीब हो। इनके अलावा मौसमी अचार बनते हैं। हरी सब्जियों, आमला, आंवला, करौंदा, हरी मिर्च के मौसमी अचारों का मजा अलग है। ये अचार जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से खत्‍म भी हो जाते हैं। शहरों में पले-बढ़े बच्‍चे मौसमी अचारों से वंचित हो चुके हैं। दादी-नादी साथ में रहती नहीं और मम्‍मी-पापा को आता नहीं। डिपार्टमेंटल स्‍टोर और माल के इस दौर में रैक में करीने से सजे डिफरेंट ब्रांड के अचार खुद को उठाने के लिए आमंत्रित करते हैं। हम उठा लेते हैं। घर लाते हैं। पहला चम्‍मच निकालते हैं और जीभ पर डालते ही पछताते या पारंपरिक अचार को याद करते हैं। अचार है कि छूटता नहीं और लापरवाही ऐसी है कि हम देसी अचार खोजते नहीं। बिहार और यूपी में अगर अभी तक आप आप की जड़ें बची हुई हैं और वहां के खाद-पानी का अभी तक असर हो तो मुमकिन है कि आज भी आप के घरों में जतन से मंगवा कर रखा अचार मिल जाए।
कहीं अपने नियमित भोजन में अचार शामिल करने को पिछड़ापन समझने वालों की जमात में तो आप शामिल नहीं हैं ? मेरे कई दोस्‍तों ने तो आधुनिक होने के चक्‍कर में अचार चाटना और खाना छोड़ दिया है। और मुआ आज कल के डाक्‍टर… ये सारे डाक्‍टर अपने ट्रैडिशनल भोजन को ही सबसे पहले खारिज करते हैं। ये मत खाओ, वो मत खाओ… सेहत का खयाल रखो। सेहत के खयाल में स्‍वाद की सामूहिक हत्‍या कर देना मुझे मंजूर नहीं। मैं तो आज भी बड़े स्‍वाद और यत्‍न-प्रयत्‍न से अचार खाता हूं। आम और मिर्च के अलावा मौसमी अचार भी खाता हूं। कोई मेहमान आ जाए तो उसे भी खिलाता हूं। बिहार से आ रहे भाई, बहन, रिश्‍तेदारों से एक फरमाईश जरूर रहती है कि अचार लेते आना। वे लाते भी हैं।
मेरे एक पुराने सहयोगी हैं उमेश उपाध्‍याय। अब साथ नहीं काम करते, लेकिन मेरे अचार प्रेम को जानते हैं, इसलिए हर साल विशेष रूप से अचार लेकर आते हैं। यह अचार मुंबई में उनकी पत्‍नी बनाती हैं। उनके हाथों के अचार का रंग और स्‍वाद थोड़ा अलग होता है। दूसरे व्‍यंजनों की तरह हर परिवार मोहल्‍ले और इलाके के अचारों का स्‍वाद अलग होता है। भारत सिर्फ भाषा और संस्‍कृति में ही नहीं,अचार में भी विविधताओं का देश है।कभी बंगाल और असम के अचार चख कर देखें। या कभी केरल और कश्‍मीर के साथियों से अचार मंगवा कर परखें।
दुनिया में अकेला भारत ही ऐसा देश है, जहां आज भी अचार बनाया और खाया जाता है। यों कह ले कि भारतीय प्रायद्वीप के देशों में ही अचार पला और बढ़ा है। भारतीय व्‍यंजन विदेशों और विदेशियों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। किसी उद्धमी को चाहिए कि वह ट्रैडिशनल अचार की पैकेजिंग और मार्केटिंग करे। उनमें सदियों पुराना स्‍वाद और रंग रहने दे। उन्‍हें आधुनिक तकनीक से देहातों से शहर लाए। आधुनिक मॉल में सजाए और हमारे पूर्वजों के अर्जित स्‍वाद को आगे बढ़ाए। अचार में समाहित नमक, मिर्च और तेल हमारे व्‍यंजन से गायब हो गए तो हम कितने भारतीय रह पाएंगे? न हमारी जीभ तेज रहेगी और न बातों में चटखारापन आएगा। तंज मारने की कला अचार से ही आती है।
आप अपने परिवार में प्रिय अचार के बारे में बताएं?
स्‍वादिष्‍ट अचार बनाने की कुछ विधियां

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

brahmatmaj के द्वारा
April 12, 2010

पिछले दिनों रंगकर्मी शेखर सेन से मुलाकात हुई। उन्‍होंने अचार से संबंधित अपनी मां के किस्‍से सुनाए।उन्‍होंने मरने सं पहले अचार बनवा कर सभी पड़ोसियों के यहां बंटवा दिया था ओर कहा था कि इस तरह मैं साल भर और जिंदा रहूंगी सभी के बीच। अद्भुत सोच है।उनकी मां की स्‍मृति को नमन।

kmmishra के द्वारा
April 11, 2010

अचार पर काफी ज्ञानवर्धक लेख । चाट पर ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिये पढ़े “चटोरी लड़कियां” कृपया नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक करें । http://www.kmmishra.jagranjunction.com

Priyanka Shukla के द्वारा
April 1, 2010

आहा! आचार सुनते ही मुंह में पानी आ गया. मैं तो आज भी उतने ही शौक से आचार बनाती हूँ और चटकारे लेकर खाती भी हूँ ,हाँ अब घर पर वो पहले जैसा आचार नहीं बनता जो दादी बनाया करती थी पर विरासत में ये कला उनसे ले ली मैंने और इसीलिए मैं तो नहीं तरसती घर के आचार के लिए तो आप भी कुछेक आचार बनाना सीख ही लीजिये और फिर चटकारे लेकर खाइए अपने मनपसंद आचार.

    brahmatmaj के द्वारा
    April 1, 2010

    आप दो-चार यहां शेयर करें तो स्‍वाद बढ़े।

razia mirza के द्वारा
March 31, 2010

चलो आज तो मैंने भी आखिर बेसनी-हरीमिर्च बना ही डाली। और खा भी लीया। मज़ा आया।

    brahmatmaj के द्वारा
    March 31, 2010

    हमें भी मालूम हो बेसनी-हरी मिर्च की विधि। आप वाली…मजा आया कि नहीं ?

आकांक्षा के द्वारा
March 30, 2010

वाह आपने तो खट्टी मीठी यादें ताज़ा कर दी जब छत पर अचार के लिए केरी डाली जाती थी और हम इंतज़ार करते थे की दादी और माँ छत से नीचे जाए तो हम उनसे छुपके छत पर आने का मौका तलाशे और थोड़ी सी केरी चोरी कर ले हाहाहा गला ख़राब होने की दुहाई देकर डांट जो पड़ती थी

    brahmatmaj के द्वारा
    April 1, 2010

    बचपन की डांट का अलग ही मजा है। तब के रोने पर भी अब हंसी आती है।

Puja Upadhyay के द्वारा
March 29, 2010

आहा अचार…सबसे पहले तो याद आता है थोड़ा भी बादल दिखते ही छत पर भागना, बुजाम उठाने के लिए. और हॉस्टल की सब्जी पर जीना भगवान भरोसे नहीं अचार भरोसे होता था. मेरी नानी अब अचार नहीं बनाती, पर उसके हाथ का अचार बहुत मिस करती हूँ. वैसा स्वाद कहीं आ ही नहीं पाता. कोई तरीका होता हाथ के स्वाद को भी डब्बे में रखने का…एस्सेंस टाइप. नानी के हाथ का एस्सेंस किसी भी अचार में एक बूँद डाल दिया, हो गया नानी के अचार सा स्वाद. आपके इस लेख से क्या क्या खाने का मन करने लगा….उफ्फ्फ

    brahmatmaj के द्वारा
    April 1, 2010

    फिर खाया कि नहीं ?

सचिन श्रीवास्तव के द्वारा
March 29, 2010

शानदार। अहा अहा। एक ही बार में चाट गया पूरा। मजेदार स्वादी। गंदे हाथ लगाये बिना खाया है। नमक मिर्च तेल सब बराबर और धूप में सेंका भी खूब है। खास आपकी पकी हुई दाडी की तरह पुराने अचार सा स्वाद http://www.ekkadamaage.com

    brahmatmaj के द्वारा
    March 30, 2010

    खो रहे हैं हमारे बचपन के स्‍वाद। अनजाने ही हम एकरस और बेस्‍वादी होते जा रहे हैं।

अविनाश वाचस्‍पति के द्वारा
March 29, 2010

अजय जी द्वारा रचित अचार कथा, जो कि अचार बनाने की तरह ही रची गई है, ने मन मोह लिया परंतु एक बात का जिक्र अवश्‍य करना चाहूंगा कि आजकल अचार में चूहों की दिलचस्‍पी बढ़ गई है। पिछले दिनों मध्‍यप्रदेश में अचार के पांच किलो की पैकिंग में 250 ग्राम का एक चूहा मिला है। वैसे भी मानव सारे प्रयोग चूहों पर ही जांच करके परखता है। उसी की कड़ी हो सकती है शायद, चूहा अचार में इतना रम गया हो कि रम उल्‍टा और वो मर गया। फिर भी अचार की अचारियत निर्विवाद रूप से कायम रहेगी और रहनी भी चाहिए, डॉक्‍टरों के भरसक प्रयासों के बाद भी। इसी कामना के साथ आपके सुर में सुर मिलाते हुए ‘अचार मिले तुम्‍हारा हमारा, तो अचार बने न्‍यारा’। 77

Minaksi के द्वारा
March 29, 2010

अचार की इस महिमा ने बचपन की यादों को एक बार फिर ताजा कर दिया… छुट्टियों में गाँव जाना. ताई जी, के हाथो का बना स्वादिष्ट अचार और बार बार जिद करके मांगना… मम्मी से ज्यादा अचार खाने के नाते डाट खाना … लेकिन फिर भी शौक से अचार खाना… नानी, मौसी,ताई,चाची सबके हाथो का मजेदार अचार … शहर में रहने के कारण उससे दूर रहे लेकिन मम्मी के हाथ के अचार ने वो दुःख एक पल में दूर कर दिया…. ये अचार है लाजवाब …..

aghuvendra के द्वारा
March 29, 2010

लेख पढ़कर मुझे आजी की याद आ गई। आजी खुद अचार बनाती थीं। गजब का स्वाद होता था उनके अचार में। आजी अचार को अपनी कोठरी में ताला मारकर रखती थीं। किसी को अचार चाहिए होता था तो वे खुद ताला खोलती थीं और अपने हाथ से अचार देती थीं। अब आजी नहीं रहीं। उनके हाथों के बने अचार में जो स्वाद होता था, अब वह भी नहीं रहा। काश, बचपन में जाने का फिर मौका मिल जाता..तो अचार का वह स्वाद फिर से चख लेते।

    vineet kumar के द्वारा
    March 29, 2010

    इस मौसम में कभी घर में उत्सवी महौल रहता। छतों पर आम को काट-छीलकर,उसमें हल्दी-नमक लगाकर जिसे कि मां फांक कहती,सूखता रहता। मां दिनभर उसे अगोरती(रखवाली करती)। बीच-बीच में कहा भी करती कि मेरा आंख बंद हुआ कि इसब घर से खत्म हो जाएगा। तुमलोग की बहू थोड़े ही न ये सब करेगी। बाद में मां को मैंने ही आइडिया दिया था कि तुम जिस चादर पर ये फांक फैलाती हो उसके उपर मच्छरदानी लगा दो,कौए कुछ नहीं बिगाडेंगे इसका। बाद में मां ने ऐसा ही किया।..तो ये तैयारी तो खट्टे अचार की होती। मीठे अचार के लिए लग से मसाला बनता,जीरे की खुशबू से पूरा घर भर जाता। गुड का सिरा बनता और उसमें पानी और सोड़े में उबाले आम का टुकड़ा।..पूरे मोहल्ले में ऐसा लगता कि कोई जिले स्तर की आम बनाने की प्रतियोगिता हो रही है और महिलाओं को मेडल मिलने जा रहा है। जिन घरों में अचार नहीं बनता,उस घर के बच्चे उदास होते क्योंकि उन्हें ताम-झाम करने का मौका नहीं मिलता।..

    brahmatmaj के द्वारा
    March 30, 2010

    बचपन का स्‍वाद अभी लुप्‍त नहीं हुआ है। हम सभी उसे गंवा रहे हैं। अगली बार गांव जाएं तो अचार लेकर आए।


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